वक्त की सुनहरी रेत कविता - Waqt Ki Sunhari Ret Poem

Waqt Ki Sunhari Ret Poem, इसमें वक्त की सुनहरी रेत नामक कविता के माध्यम से इंसान अपने बीते हुए दिनों की याद और कुछ कर पाने की कसक को बताने की कोशिश है।

Waqt Ki Sunhari Ret Poem

वक्त की सुनहरी रेत कविता के बोल - Lyrics of Waqt Ki Sunhari Ret Poem


अगर मैं
चला जाऊँ दुनिया से
तो क्या होगा?
रोएँगे चंद लोग
दुखी होंगे चंद लोग
बताएँगे चंद लोग इसे
भगवान की मर्जी
फिर कुछ दिनों के बाद
सब वैसा ही हो जाएगा
जैसा मेरे जाने से पहले था।

इंसान का वजूद
पानी का बुलबुला है
इस बात का पता
तभी चलता है
जब शरीर छूटने लगता है
और मन टूटने लगता है।

यादें लगती हैं सताने
सालते हैं पुराने जमाने
बीते वक्त की सुनहरी रेत
हथेलियों से फिसल जाती है
इंसान मुट्ठी भींचता रहता है,
जिंदगी ऐसे ही निकल जाती है।


किसी की राहों में
कुछ समय का मुसाफ़िर था
किसी की धड़कनों में
बस एक पल का असर था
कौन किसे याद रखता है यहाँ
सब अपने सफ़र में खो जाते हैं
आँसू देखकर हँसते-हँसते
धीरे-धीरे आगे बढ़ जाते हैं।

काश ऐसा होता…
किसी मोड़ पर
समय थम जाता
अपने कदमों की आहट
फिर से सुन पाता
जो बातें कह न पाया
जो रिश्ते निभा न पाया
अधूरी दास्तानों का बोझ
दिल से मिटा पाता।

जिंदगी का यही फलसफ़ा
हम आते हैं
चले जाते हैं,
थोड़ा हँसाते हैं
थोड़ा रुलाते हैं
और दर्द बढ़ाते-बढ़ाते
चुपचाप निकल जाते हैं
कहानी खतम हो जाती है
एक याद बनकर
तस्वीरों में लटक जाते हैं।

यही सबकी कहानी है
जानी और अनजानी है
ऐसे ही चुपचाप
जवानी बीत जाती है
वक्त का पहिया
चलता रहता है
बचपन की सुबह
यौवन की दोपहर
बुढ़ापे की शाम
जाने कैसे गुजरते रहे
फिर भी अनजान बनकर
हम खुद को ही छलते रहे।

खुद को ही छलते रहे।

वक्त की सुनहरी रेत कविता का वीडियो - Video of Waqt Ki Sunhari Ret Poem



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डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस कविता की समस्त रचनात्मक सामग्री रमेश शर्मा की मौलिक रचना है। कविता में व्यक्त विचार, भावनाएँ और दृष्टिकोण लेखक के स्वयं के हैं। इस रचना की किसी भी प्रकार की नकल, पुनर्प्रकाशन या व्यावसायिक उपयोग लेखक की लिखित अनुमति के बिना वर्जित है।
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