रोती है बावड़ी कविता - Roti Hai Baori Poem

Roti Hai Baori Poem, इसमें श्रीमाधोपुर की कायथवाल बावड़ी की वर्तमान दुर्दशा को रोती है बावड़ी नामक कविता के माध्यम से बताया गया है।

Roti Hai Baori Poem

रोती है बावड़ी कविता के बोल - Lyrics of Roti Hai Baori Poem


दरवाज़े वाले बालाजी से आगे,
ख़ामोशी ओढ़े खड़ी है बावड़ी।
प्यासे मुसाफ़िर, थके हुए पाँव,
कभी राहत देती थी ये बावड़ी।

सत्रह सौ सतासी की वो कहानी,
मोतीलाल का सपना था पानी।
तिबारी, मंदिर, शीतल छाया,
जीवन की धारा थी ये बावड़ी।

रोती है बावड़ी, सुन लो पुकार,
पत्थर भी आज बहा रहे हैं अश्रुधार।
धरोहर है ये, मत होने दो बेकार,
बचा लो इसे, यही है उपकार।

चार मंज़िल गहरी, फैली विशाल,
राजमहल से कम न था इसका हाल।
जनाना द्वार, मर्दाना राह,
शिल्प की भाषा कहे इतिहास।

मेहराबें बोलीं, सीढ़ियाँ चुप,
गलियारों में गूँजे बीते स्वरूप।
कौड़ियों की अराइश, चित्र अपार,
आज उजड़कर पूछे—कौन है रखवाला यार?

रोती है बावड़ी, सुन लो पुकार,
पत्थर भी आज बहा रहे हैं अश्रुधार।
धरोहर है ये, मत होने दो बेकार,
बचा लो इसे, यही है उपकार।

राजस्थान सूखा, जल की कमी,
क्यों क्यों भूल गए हम ये ज़मीं?
सालों भर देती थी निर्मल जल,
आज कूड़े में दबा है इसका कल।

जिसे पूजना था, हमने रुलाया,
अमूल्य धरोहर को कूड़ेदान बनाया।
कचरे से भरकर मिटाने की चाल,
क्या यही है विकास का हाल?


ये सिर्फ़ पत्थर नहीं, संस्कार है,
पूर्वजों का दिया उपहार है।
अगर आज भी हम न जागे दोस्त,
तो कल पछतावे का भार है।

आश्रम हो, प्रशासन हो, या हो जनता,
सबकी बनती है इसमें सहभागिता।
साफ़ न कर सको, गंदा मत करो,
इतना सा धर्म तो निभा लो ज़रा।

एकजुट होकर हाथ बढ़ाओ,
इस बावड़ी को फिर से सजाओ।
पर्यटन बने, पहचान बने,
जल और इतिहास की शान बने।

रोती है बावड़ी, अब मत टालो बात,
आज नहीं चेते तो मिट जाएगा इतिहास।
धरोहर है ये, आने वाली संतान की,
बचा लो बावड़ी, बचाओ पहचान अपनी।

रोती है बावड़ी कविता का वीडियो - Video of Hindi Diwas Poem



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डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस कविता की समस्त रचनात्मक सामग्री रमेश शर्मा की मौलिक रचना है। कविता में व्यक्त विचार, भावनाएँ और दृष्टिकोण लेखक के स्वयं के हैं। इस रचना की किसी भी प्रकार की नकल, पुनर्प्रकाशन या व्यावसायिक उपयोग लेखक की लिखित अनुमति के बिना वर्जित है।
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